tag:blogger.com,1999:blog-3943732634238987000.post-42735433483587063262007-01-17T19:10:00.001+05:302007-01-17T19:10:02.572+05:30पुरातन सभ्यताएँ एवम् उनका विज्ञानमनुष्य हमेशा से अपने पूर्वजों को मुर्ख समझता आया है और वह कभी यह बात मान नहीं सकता कि आदि(!!) मानव ने ऐसे कार्य कर रखे हों जिन्हे करना उसके बूते से बाहर हो (कयी उदाहरण हैं - बाद में)। आज के वेज्ञानिक सिर्फ जितना वह खोद सकते हैं उतना सच मानते हैं और उसके अलावा जो होता है उसे बेबुनियाद कह के सिरे से खारिज कर देते हैं। वह यह मानने को तैयार ही नहीं होते कि उनकी भी कुछ सीमा (परिमितता) हो सकती हैं। अभी हाल ही में मेरी (गिद्ध सी :D) नज़र <a href="http://www.wired.com/wired/archive/15.01/khipu.html?pg=1&topic=khipu&topic_set=">इस लेख</a> पर गयी; समय हो तो ज़रूर पढ़येगा।<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3943732634238987000-4273543348358706326?l=lahotihindi.blogspot.com'/></div>Shubham Lahoti शुभम् लाहोटीhttp://www.blogger.com/profile/05174599040194444371noreply@blogger.com1